सियासी झंझावत से जूझते रहे खंडूरी
देहरादून. आखिरकार सूबे की सियासत जनरल खंडूरी को रास नहीं आई. भाजपा हाईकमान की पसंद खंडूरी सवा दो साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री तो रहे, लेकिन इस दौरान वह सियासी झंझावतों से ही जूझते रहे. बतौर मुख्यमंत्री खंडूरी का सवा दो साल का कार्यकाल खुद उनके लिए बेहद कष्टकारी रहा. ताजपोशी के दिन से शुरू हुआ उनका विरोध प्रदेश से उनकी विदाई के दिन तक चलता रहा. इसमें कोई दो-राय नहीं है कि सवा दो साल के कार्यकाल में उनका दामन बेदाग रहा. इसके बावजूद खंडूरी न जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतर पाए न अपने दल के विधायकों की सफरनामे पर गौर करें तो खंडूरी पहले ही दिन से मुख्यमंत्री के रूप में ऐसी कुर्सी पर बैठाए गए जिसके चारों 'पायोंÓ में से एक भी 'पायाÓ उनका अपना नहीं था. केंद्र में बतौर मंत्री रहकर देशभर में यश कमा चुके खंडूरी से जनता और संगठन दोनों को बड़ी उम्मीदें रहीं. प्रशासन उनकी छवि को लेकर खौफजदा रहा तो राजनेताओं में भी उनकी दहशत रही. लेकिन खंडूरी की पारी की शुरूआत प्रदेश में कुछ ऐसी रही कि खंडूरी खुद सियासी चक्रव्यूह में फंस कर रह गए. हकीकत यह है कि प्रदेश के लिए कुछ सोचने और करने का जनरल को समय ही नहीं मिला. प्रदेश की 'नब्जÓ पकडऩे के बजाय उनकी पूरी ऊर्जा कुर्सी के 'पायोंÓ को संभालने में लगी रही. जाने-अनजाने वह इस चक्रव्यूह में शह और मात के खेल में फंसते चले गए. आखिरकार उनकी पूरी सियासत भी आत्मकेंद्रित होती चली गई. धुमाकोट विधानसभा का उपचुनाव हो या फिर पौड़ी लोकसभा का उपचुनाव दोनों ही उनके लिए बड़ी चुनौती रहे. विधायकों में भले ही वह अपनी पैंठ न बना पाए हों, लेकिन प्रदेश संगठन में बड़े पदों पर अपनी पसंद के लोगों को बैठाने में खंडूरी कामयाब रहे. इतना सब होने के बावजूद खंडूरी की राह कांटों भरी ही रही. पंचायत और निकाय चुनावों से पहले और फिर लोकसभा चुनाव से पहले नाखुश विधायकों की 'मुहिमÓ खंडूरी को झटका देती रही, तो सवा दो साल में अधिकांश समय अधिसूचना ने उनके हाथ बांधे रखे. यह भी सही है कि सियासी खेल में उनका हर दांव विरोधी खेमे पर भारी पड़ा और वह ताकतवर होते चले गए लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने पूरा खेल पलट कर रख दिया.
गुरुवार, 25 जून 2009
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