गुरुवार, 25 जून 2009

पहले ही फाइनल हो गए थे निशंक
देहरादून। मुख्यमंत्री की कुरसी पर डॉ। रमेश पोखरियाल निशंक की ताजपोशी मंगलवार की रात ही तय हो गई थी. २२ विधायकों ने जिनमें खुद मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी और कई मंत्री शामिल हैं, ने एक पत्र पर उनके नाम पर दस्तखत कर दिए थे. दावेदारी से भगत ङ्क्षसह कोश्यारी के हट जाने के बाद डॉ. निशंक के लिए फतह की राह खासी आसान हो गई थी. उत्तराखंड निवास में देर रात तक हुई बैठक में खंडूरी के साथ ही कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत, मातबर ङ्क्षसह कंडारी, मदन कौशिक, अजय टम्टा, बिशन ङ्क्षसह चुफाल भी मौजूद थे. बैठक में अगले दिन की रणनीति बनाई गई. सूत्रों के अनुसार खंडूरी ने बैठक में साफ कर दिया कि वह अब मुख्यमंत्री बने रहने की स्थिति में नहीं हैं. वह इस दौड़ से अलग हो चुके हैं. उन्होंने इसके बाद डॉ. निशंक का नाम अपने उत्तराधिकारी के तौर पर सभी के सामने रखा.इसमें तय हुआ कि सभी लोग मतदान में डॉ. निशंक को ही वोट देंगे. इसके साथ ही एक पत्र भी टाइप कराया गया. इसमें मौजूद सभी २२ विधायकों ने दस्तखत कर डॉ. निशंक को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया. यह पत्र हाईकमान को आज सौंपा गया. हालांकि, इसके बावजूद शीर्ष नेतृत्व ने उत्तराखंड निवास में गुप्त मतदान का सहारा लिया.मतदान के दौरान वैंकेया नायडू और थावरचंद गहलौत मौजूद थे. चुनाव में खंडूरी ने औपचारिकता के तौर पर डॉ. निशंक का नाम प्रस्तावित किया और प्रकाश पंत, मातबर ङ्क्षसह कंडारी ने समर्थन किया. मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत को भगत ङ्क्षसह कोश्यारी का समर्थन हासिल था लेकिन सूत्रों के अनुसार ऐन वक्त पर माहौल देख कुछ और कोश्यारी समर्थक पाला बदल गए. दरअसल, कोश्यारी के मैदान से अलग हो जाने के कारण उनके कुछ समर्थकों ने मजबूत दिख रहे डॉ. निशंक का साथा देना बेहतर समझा. नेता विधान मंडल दल चुने जाने के बाद बाद में डॉ. निशंक ने कोश्यारी से भी उत्तराखंड निवास में ही मुलाकात कर उनसे आशीर्वाद लिया.


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सियासी झंझावत से जूझते रहे खंडूरी
देहरादून. आखिरकार सूबे की सियासत जनरल खंडूरी को रास नहीं आई. भाजपा हाईकमान की पसंद खंडूरी सवा दो साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री तो रहे, लेकिन इस दौरान वह सियासी झंझावतों से ही जूझते रहे. बतौर मुख्यमंत्री खंडूरी का सवा दो साल का कार्यकाल खुद उनके लिए बेहद कष्टकारी रहा. ताजपोशी के दिन से शुरू हुआ उनका विरोध प्रदेश से उनकी विदाई के दिन तक चलता रहा. इसमें कोई दो-राय नहीं है कि सवा दो साल के कार्यकाल में उनका दामन बेदाग रहा. इसके बावजूद खंडूरी न जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतर पाए न अपने दल के विधायकों की सफरनामे पर गौर करें तो खंडूरी पहले ही दिन से मुख्यमंत्री के रूप में ऐसी कुर्सी पर बैठाए गए जिसके चारों 'पायोंÓ में से एक भी 'पायाÓ उनका अपना नहीं था. केंद्र में बतौर मंत्री रहकर देशभर में यश कमा चुके खंडूरी से जनता और संगठन दोनों को बड़ी उम्मीदें रहीं. प्रशासन उनकी छवि को लेकर खौफजदा रहा तो राजनेताओं में भी उनकी दहशत रही. लेकिन खंडूरी की पारी की शुरूआत प्रदेश में कुछ ऐसी रही कि खंडूरी खुद सियासी चक्रव्यूह में फंस कर रह गए. हकीकत यह है कि प्रदेश के लिए कुछ सोचने और करने का जनरल को समय ही नहीं मिला. प्रदेश की 'नब्जÓ पकडऩे के बजाय उनकी पूरी ऊर्जा कुर्सी के 'पायोंÓ को संभालने में लगी रही. जाने-अनजाने वह इस चक्रव्यूह में शह और मात के खेल में फंसते चले गए. आखिरकार उनकी पूरी सियासत भी आत्मकेंद्रित होती चली गई. धुमाकोट विधानसभा का उपचुनाव हो या फिर पौड़ी लोकसभा का उपचुनाव दोनों ही उनके लिए बड़ी चुनौती रहे. विधायकों में भले ही वह अपनी पैंठ न बना पाए हों, लेकिन प्रदेश संगठन में बड़े पदों पर अपनी पसंद के लोगों को बैठाने में खंडूरी कामयाब रहे. इतना सब होने के बावजूद खंडूरी की राह कांटों भरी ही रही. पंचायत और निकाय चुनावों से पहले और फिर लोकसभा चुनाव से पहले नाखुश विधायकों की 'मुहिमÓ खंडूरी को झटका देती रही, तो सवा दो साल में अधिकांश समय अधिसूचना ने उनके हाथ बांधे रखे. यह भी सही है कि सियासी खेल में उनका हर दांव विरोधी खेमे पर भारी पड़ा और वह ताकतवर होते चले गए लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने पूरा खेल पलट कर रख दिया.


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टीम भावना पैदा करने की चुनौती
देहरादून. मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेते ही डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के सामने सूबे में कमल के फूल को खिलाए रखने और पार्टी में टीम भावना पैदा करने की अहम जिम्मेदारी होगी. उनके कंधों पर पार्टी को वर्ष २०१२ के विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने का दारोमदार भी रहेगा. सही मायने में कहा जाए तो ढेरों चुनौतियां नए मुख्यमंत्री का इंतजार कर रही हैं.खंडूरी को उनके भारी-भरकम नाम और शीर्ष स्तर पर पकड़ के बावजूद सवा दो साल में ही सरकार से विदा होना पड़ा. इसके लिए उनकी संगठन और निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं से दूरी को जिम्मेदार माना जा रहा है. डॉ. निशंक को इससे ही सबक लेना होगा. वह सरकार और संगठन में तालमेल बनाए रखते हुए आगे बढ़ेंगे, ऐसा सियासी समीक्षकों का मानना है. खंडूरी को मुख्यमंत्री बनने से पहले और हटने तक लगातार कोश्यारी समर्थकों की तरफ से हमलों और विरोध का सामना करना पड़ा था.डॉ. निशंक की कोशिश इस मोरचे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा कर इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म करना भी एक चुनौती है. मंत्रिपरिषद केगठन में भी उनकी दूरगामी सोच काफी हद तक दिख जाएगी.डॉ. निशंक को फिलहाल, सबसे पहले विकासनगर विधानसभा उपचुनाव जिताना होगा. यहां हालात भाजपा के लिए अच्छे नहीं माने जा रहे हैं. इसके बाद विधानसभा के आम चुनाव में भी जीत दिलानी होगी.नौकरशाही को सूबे में निरंकुश माना गया है. खंडूरी उन्हें काबू में नहीं रख पाए. निशंक नौकरशाही से काम लेने के मामले में अनुभवी हैं. लिहाजा, इसमें उन्हें दिक्कत नहीं होगी.इसके साथ ही बिजली, पीने के पानी का संकट, छठे वेतन आयोग की सिफारिशें सभी कर्मियों पर लागू करना, सरकारी स्कूलों की दुर्दशा, कमजोर वित्तीय स्थिति से पार पाने के लिए भी नए मुख्यमंत्री को जूझना पड़ेगा.


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अब राहत महसूस कर रही है नौकरशाही
देहरादून. राजनीतिक अस्थिरता से त्रस्त नौकरशाही अब थोड़ा राहत महसूस कर सकती है. नेतृत्व परिवर्तन के बाद कामकाज की स्थिति सुधरने की उम्मीद की जा रही है. नहीं, तो पिछले कुछ समय से कामकाज पर बे्रक लग गया था. दावेदारों की दिल्ली दौड़ के चलते अहम मुद्दों पर असमंजस की स्थिति गहरा गई थी. नौकरशाही ने भी स्थिति संभालने के लिए पहल करना मुनासिब नहीं समझा. सीधा असर आम आदमी पर पड़ा, जो कि शिकायतों के हल के लिए इधर से उधर चक्कर काटता रहा.सरकार के मुखिया बदलने पर अंतिम निर्णय हो जाने के बाद अब स्थिति बदल सकती है. अभी तक का जो हाल रहा है, उसमें काम की समीक्षा ज्यादा हुई, काम कम हुए. नौकरशाही पर अंकुश लगाने की कोशिश भी हुई, मगर जहां मौका मिला, नौकरशाही ने अपने हिसाब से काम किया. इस स्थिति के चलते आम आदमी के काम लटके और सरकार की छवि खराब हुई. उत्तरांचल विकास से लेकर वित्त, राजस्व, पेयजल, सूचना और स्वास्थ्य विभाग का काम देख चुके डॉ.निशंक के सामने नौकरशाही से बेहतर काम लेने की चुनौती होगी. वैसे, डॉ.निशंक को लेकर अफसरों के ये अनुभव रहे हैं कि वे संतुलन स्थापित कर काम लेते हैं. सीएम के तौर पर उन्हें और प्रभावी ढंग से संतुलन साधने की आवश्यकता होगी.


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सुबह होते ही दे दिया था इस्तीफा
देहरादून. मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी ने भाजपा विधायक दल के नेता की कुरसी से इस्तीफा सुबह होते ही दे दिया था. पार्टी के प्रदेश सह प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने उनका इस्तीफा राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ ङ्क्षसह को सौंपा. आलाकमान ने इसके साथ ही खंडूरी और उनके खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले भगत ङ्क्षसह कोश्यारी को फिलहाल, खामोश रहने की हिदायत दी गई है.खंडूरी इस्तीफा देंगे, यह तो मंगलवार देर रात तय हो गया था. इसके बाद सुबह डॉ. जैन ने उनका इस्तीफा उत्तराखंड निवास से लिया और राजनाथ को उनके आवास पर जाकर दे आए. राजनाथ को सुबह ही जम्मू के लिए निकलना था. वह इस्तीफा स्वीकार करने के बाद रवाना हुए. यह बात अलग है कि खंडूरी के इस्तीफे के बारे में आधा दिन गुजर जाने तक भी लोगों और मीडिया के पास पुख्ता जानकारी नहीं थी. यही हालत मंत्रियों और विधायकों की थी. वे भी एक दूसरे से या फिर मीडिया और सूत्रों से इस्तीफे के बारे में मालूम करने की कोशिश करते रहे.डॉ. जैन ने इस बारे में कुछ भी जानकारी देने में असमर्थता जताई. कहा कि इस बारे में कुछ भी कहने के लिए वह अधिकृत नहीं हैं. सूत्रों के अनुसार खंडूरी को हटाने के बारे में कल शाम तक भी हाईकमान फैसला नहीं कर पाया था. शाम ढलने के बाद उन्हें इस बारे में बताया गया. सूत्रों के अनुसार हाईकमान ने अब खंडूरी और उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी भगत ङ्क्षसह कोश्यारी को साफ शब्दों में चेता दिया है कि वे नए नेता विधायक दल के बारे में कोई सियासत न करें. उन्हें वरिष्ठ होने का हवाला देते हुए कहा गया कि उनकी कोई भी हरकत पार्टी में हलचल शांत करने की कोशिशों में विघ्न डाल सकता है.


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पर्यटन में हिमाचल की तुलना में उत्तराखंड का खर्च दोगुना लो इकोनामिक एक्टिविटी होने के कारण है समस्या
देहरादून। हिमाचल से तुलना की जाए तो पर्यटन उत्तराखंड पर बोझ बनता नजर आ रहा है. तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के कारण हर साल सरकार को अधिक निवेश करना पड़ रहा है. इसके उलट पर्यटन से खास आय सरकार को नहीं हो पा रही है.उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनाने की बात भी की जाती रही है. इसके लिए कोशिश भी की गई. अलग से पर्यटन विकास परिषद का गठन भी किया गया. हिमाचल की तुलना में यहां पर्यटन दोगुने से ज्यादा खर्च किया जा रहा है. हिमाचल में पर्यटन पर प्रति व्यक्ति करीब ५ रुपये के हिसाब से खर्च किया जा रहा है. जबकि, उत्तराखंड में करीब १२ रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से पर्यटन पर खर्च किया जा रहा है. इसके बाद भी राज्य को पर्यटन से खास फायदा नहीं हो रहा है. सरकार की असली परेशानी तीर्थयात्री हैं. प्रदेश की ओर रुख करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है. लो इकोनामिक एक्टिविटी के कारण खास फायदा भी सरकार को नहीं हो रहा है. वहीं, तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने में सरकार को खासा खर्च करना पड़ रहा है. यही कारण है कि प्रदेश में पर्यटन और तीर्थाटन को अलग-अलग देखने पर भी जोर दिया जा रहा है.


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उत्तरकाशी: शाल और पंखी गायबJun 25, 02:41 am
उत्तरकाशी। कभी पर्यटकों की पहली पसंद उत्तरकाशी की शाल और पंखी अब यहां बनना ही बंद हो गई है। मात्र यहीं नहीं बल्कि कला केन्द्र, कालीन, हौजरी, शाल व सिलाई सेंटर भी बंद हो गए हैं।
वर्ष 1985 से 95 तक उत्तरकाशी के उद्योग केन्द्र ने स्वर्णिम काल देखा है। इस दौरान हर्षिल, डुण्डा, बगोरी, झाला समेत अन्य इलाकों से पशुपालक बड़ी मात्रा में ऊन कातने के लिए उत्तरकाशी लाते थे और तब कार्डिग प्लांट से ही उद्योग विभाग को हर साल 5 से 6 लाख के बीच आमदनी होती थी किन्तु वर्ष 2001 में बिजली का बिल जमा न करने पर कार्डिग प्लांट बंद कर दिया गया और अब जब उद्योग केन्द्र में बिजली आई तो कार्डिग प्लांट में तकनीकी कमियां आ चुकी हैं काश्तकार उत्तरकाशी ऊन लाते ही नहीं है और ऐसे में पंखी व शाल का महत्वपूर्ण कार्य बंद पड़ा हुआ है।
लौह कला केन्द्र के बक्से, आलमारी, दराज, लाकअप समेत अन्य वस्तुएं भी बाजार में अब नजर ही नहीं आती है। विभाग का लौह कला केन्द्र भी बंद हो चुका है। विभाग वर्तमान में सिर्फ पापड़ी उद्योग ही संचालित कर पा रहा है। इस उद्योग में लकड़ी वस्तुएं तैयार की जाती है। मंदिर व लकड़ी के खिलौने बनाए तो जा रहे हैं किन्तु इसकी बिक्री बहुत कम होने से फिलहाल विभाग सरकार पर एक बोझ से कम नहीं है। काष्ठ, लौह, शॉल और पंखी के विशेषज्ञ करीब 16 कर्मचारी सरप्लस घोषित है। इन कर्मचारियों को वर्तमान में बिना काम के वेतन मिल रहा है। जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक एसबी बहुगुणा ने बताया कि उत्तर प्रदेश शासनकाल में मजमूदार कमेटी ने अधिकतर लघु उद्योग घाटे के चलते बंद करवा दिए थे। उन्होंने कहा कि पृथक राज्य बनने के बाद अब लघु उद्योगों को फिर से स्थापित करने का कार्य चल रहा है। इस दिशा में उत्तरकाशी में हिमाद्री शो रूम का निर्माण किया जा रहा है। करीब 1 करोड़ 13 लाख की लागत से निर्मित होने वाले इस इम्पोरियम में बंद पड़े लघु उद्योगों को फिर से स्थापित किया जाएगा।


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बुधवार, 3 जून 2009


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सोमवार, 1 जून 2009

समाचार

हरीश रावत राज्यमंत्री बने
अर्से बाद मिली खुशी.....दीवाली बन गई
देहरादून. जोरदार जीत और उसके बाद मंत्री के रूप में ताजपोशी. खुशी की तो बात है ही. उत्तराखंड से कांग्रेस को लंबे अर्से बाद मंत्रिमंडल में स्थान जो मिला. फिर कांग्रेसी कैसे अपनी भावनाओं को रोक पाते. सांसद श्री हरीश रावत को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की खुशी में कांग्रेसजनों ने राजधानी स्थित प्रदेश कांग्रेस के मुख्यालय में जमकर आतिशबाजी कर दीवाली मनाई. ढोल-नगाड़ों की थाप पर कांग्रेसी खूब थिरके. साथ ही गूंजता रहा जय हो का उद्घोष.
उत्तराखंड में लोकसभा की सभी पांचों सीटों पर कांग्रेस का परचम लहराने पर उत्साह से लबरेज कांग्रेसियों की खुशी तब और दुगनी हो गई, जब हरिद्वार से सांसद चुने गए वरिष्ठ नेता श्री हरीश रावत को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने की घोषणा हुई. लंबे अर्से बाद यह मौका आया है, जब राज्य को केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार में प्रतिनिधित्व मिला है. इस खुशी में कांग्रेसजनों ने जश्न मना कर खुशी का इजहार किया. बड़ी संख्या में कांग्रेस व उसके आनुषंगिक संगठनों से जुड़े पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं का प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. श्री हरीश रावत को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की खुशी में ये सभी ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरके. साथ ही जमकर आतिशबाजी की गई. खुशी के पटाखों के शोर से कांग्रेस भवन गुंजायमान रहा. यही नहीं, परिसर में हर आने-जाने वाले का मुंह मीठा भी कराया जा रहा था. लगातार होती आतिशबाजी और जय हो के उद्घोष के साथ ही सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, हरीश रावत जिंदाबाद के नारे गूंजते रहे.


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मैं केशरसिंह बिष्ट...

माननीय प्रवासी बंधुओं,
सादर नमस्कार।
मैं केशरसिंह बिष्ट मूलत: टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) से हूं. पिछले 18 सालों से मुंबई के हिंदी पत्रकारिता जगत में सक्रिय हूं और वर्तमान में शहर के एक प्रमुख दैनिक 'नवभारतÓ में मुख्य उप-संपादक के पद पर कार्यरत हूं. मुंबई में मेरे परिवार की दूसरी पीढ़ी है और हम संयुक्त परिवार में जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं. समाज के बीच मेरी सक्रियता पत्रकार के रूप में अधिक है. 'जन्मभूमि उत्तरांचलÓ के रूप में एक साप्ताहिक पत्रिका के प्रकाशन में सक्रिय हूं. कोशिश है कि विभिन्न शहरों में बसे प्रवासी बंधुओं के बीच सूचना का माध्यम मजबूत किया जाए और तकनीकी के इस सशख्त दौर में हम देश के बाहर बसे प्रवासियों से भी अपने संबंधों को विस्तार दें. आप और हम मिल कर कोशिश करें तो यह असंभव नहीं है. एक राज्य के रूप में बेशक हमारी पहचान बन गयी हो, लेकिन पहचान का मसला इतने भर से खत्म नहीं होगा. उत्तराखंड की सामाजिक पहचान के लिए अभी और प्रयास किये जाने की जरूरत है और यह प्रयास निजी तौर पर किये जाने की आवश्यकता है. आपके-हमारे निजी प्रयास जब एक सूत्र में बंधेंगे तो सामाजिक पहचान का ख्वाब अवश्य साकार होगा.
धन्यवाद
आपका
केशरसिंह बिष्ट


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